नई दिल्ली : उत्तर प्रदेश पुलिस ने 9 दिसंबर 2025 को एक ऐसी एफआईआर दर्ज की है, जो सिर्फ तीन तलाक कानून का मामला नहीं है, बल्कि कानून के उस अंधेरे हिस्से (Grey area) को उजागर करती है जिस पर अक्सर चर्चा नहीं होती। अमरोहा की रहने वाली एक महिला ने आरोप लगाया है कि तत्काल तीन तलाक के बाद उसे दोबारा निकाह करने के लिए ‘हलाला’ की आड़ में गैंगरेप का शिकार बनाया गया।
क्या है पूरा मामला? : पीड़िता का आरोप है कि उसके पति, देवर और कुछ मौलवियों ने उसे वापस शादी के लायक बनने के लिए कई बार ‘हलाला’ करने पर मजबूर किया। हलाला एक ऐसी प्रथा है जिसमें तलाकशुदा जोड़े को दोबारा एक होने के लिए महिला को पहले किसी दूसरे पुरुष से शादी करनी पड़ती है और शारीरिक संबंध बनाने होते हैं। महिला ने अपनी शिकायत में कहा कि उसे हलाला के झूठे बहाने देकर, डरा-धमकाकर उसका ‘गैंगरेप’ किया गया।
पुलिस की कार्रवाई और पॉक्सो एक्ट : पुलिस ने इस मामले में 2019 के मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण अधिनियम (तीन तलाक कानून) की धारा 3 और 4 के साथ-साथ बीएनएस की रेप और धमकी देने वाली धाराएं लगाई हैं। शुरुआती जांच के बाद पुलिस ने मामले में पॉक्सो एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी हैं, क्योंकि पीड़िता ने बताया कि 2015 में जब उसकी जबरन शादी कराई गई थी, तब उसकी उम्र सिर्फ 15 साल थी। अमरोहा पुलिस ने बताया कि मुख्य आरोपी पति को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि एक हकीम और पति के चचेरे भाई समेत अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।
पीड़िता का दर्द : जुबैदा (बदला हुआ नाम) अलीगढ़ के एक प्रतिष्ठित स्कूल की पूर्व छात्रा हैं और एक अच्छे परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उन्होंने पुलिस को बताया कि उन्हें 2016 और 2021 में दो बार तीन तलाक दिया गया और इसके बाद तीन बार जबरन सुलह के नाम पर हलाला के लिए मजबूर किया गया। जुबैदा ने कहा, ‘मुझे हर बार ऐसा लगा जैसे मुझे किसी को सौंपा जा रहा है, मुझे इतनी शर्म आ रही थी कि मैं यह बात किसी को बता नहीं सकी और न ही मैं चाहती थी कि मेरी बेटी को इसके बारे में पता चले।’
कानूनी पेंच और विशेषज्ञों की राय : यह मामला भारतीय कानून की एक बड़ी खामी की ओर इशारा करता है। 2019 का कानून तुरंत तीन तलाक को तो अपराध मानता है, लेकिन इसमें हलाला का कोई जिक्र नहीं है और न ही इसे मान्यता दी गई है। सामाजिक कार्यकर्ता जाकिया सोमन का कहना है, ‘कुरान में हलाला का कोई जिक्र नहीं है। यह गलत व्याख्या और पितृसत्तात्मक सोच के कारण जीवित है. अक्सर महिलाएं शर्म या डर के कारण सामने नहीं आतीं।’ वहीं, कार्यकर्ता नाइश हसन का कहना है कि निकाह और तलाक का कोई लिखित रिकॉर्ड न होने के कारण ऐसे मामलों में महिलाओं के लिए न्याय पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
फिलहाल पति जेल में है, लेकिन उसने भी अपनी पत्नी पर झूठे केस में फंसाने और धमकाने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई है। हलाला की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाएं अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
