झारखंड : नदी-पहाड़-जंगलों में बिखरी है शिव की महिमा, तो बौद्ध-जैन-रामायण की तरह शैव सर्किट क्यों नहीं?

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रांची : आज जब देश में बौद्ध सर्किट, जैन सर्किट और रामायण सर्किट की बात होती हैं तो झारखंड के परिप्रेक्ष्य में शैव सर्किट की बात करना भी उचित प्रतीत होता है। राज्य में अजंता जैसी गुफाओं और नदियों में शिवलिंग उकेरे मिलते हैं, ऐसे में झारखंड की समृद्ध शैव को संजोने की ऐतिहासिक पहल जरूरी है। राज्य में शैव सर्किट के निर्माण से संस्कृति और पर्यटन को बढ़ावा तो मिलेगा, साथ ही सभी प्राचीन शिव मंदिरों की ऐतिहासिक समृद्ध विरासत को सहेजने और संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल भी होगी।

राज्य के प्रत्येक जिलों में स्थित प्राचीन शिव मंदिरों को एक सर्किट से जोड़ा जाना, झारखंड के विकास, विरासत संरक्षण और स्थानीय परंपरा-संस्कृति को बढ़ावा देने में एक अहम योगदान के रूप में साबित होगा।

झारखंड में 200 से भी अधिक प्राचीन शैव मंदिर और 50 मठों के प्रमाण : भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रांची मंडल के सहायक पुरातत्वविद् नीरज कुमार मिश्रा ने बताया कि झारखंड में 200 से भी अधिक प्राचीन शैव मंदिर और 50 के करीब शैव मठों के ऐतिहासिक रूप से होने के प्रमाण है। ये राज्य के हर जिलों औ सीमावर्ती राज्यों को जाने वाले मार्गों ओर हैं। ऐतिहासिक रूप से झारखंड के शैव मंदिर झारखंड से गुजरने वाले प्राचीन व्यापारिक मार्गों पर स्थित है। ये देश के प्रमुख धार्मिक यात्रा के मार्ग भी हैं, जो दक्षिण भारत से होकर छत्तीसगढ़ के रास्ते ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों से जुड़े हुए हैं। इन मार्गों पर या इनके समीप या सहमार्गों पर अत्यंत प्राचीन शिव मंदिर और मठों के साक्ष्य मिलते हैं।

झारखंड की हर दिशा में प्राचीन शिव मंदिर और मठ :

  • झारखंड के उत्तर में कोडरमा का प्रमुख प्राचीन घोड़सिमर धाम में प्राचीन शिव मंदिर और मूर्तियां अवस्थित है। दक्षिण में पश्चिमी सिंहभूम जिले के बेनीसागर में स्थित के प्राचीन शिव मंदिर शैव परंपरा की गाथा कहती है।
  • उत्तर-पूर्व में देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथधाम और दुमका में मालूटी के मंदिर समूह और बाबा बासुकीनाथ की प्राचीनता जगजाहिर है। पूर्व में बोकारो का चेचका धाम का पांचों शिव मंदिर और ऐतिहासिक अवशेष भी शैव उपासना की कहानी बताते है। दक्षिण-पश्चिम में गुमला का टांगीनाथ और पालकोट में देवगांव स्थित मंदिर समूह भी सदियों पुरानी धार्मिक संस्कृति का गवाह है।
  • दक्षिण-पश्चिम में ही लोहरदगा का अखिलेश्वार धाम, खेखपरता का प्राचीन शिव मंदिर, सिमडेगा जिले के वीरूगढ़ ओर कुद्रुम के प्राचीन शिव मंदिर के अवशेष मौजूद है। इसके अलावा रांची और खूंटी में प्राचीन शैव मंदिरों के स्थलों को एक विशेष मार्ग से जोड़कर शैव सर्किट बनाने की आवश्यकता है।

घने जंगल और पहाड़ियों के शैलाश्रय में भी शिवलिंग : पुरातत्व अनुसंधान और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार छोटानागपुर के पठारी भाग के महत्वपूर्ण हिस्से झारखंड में प्राचीन शैव मंदिरों के बहुतायत साक्ष्य प्राप्त होते हैं। घने वन्य क्षेत्रों और पहाड़ियों के शैलाश्रय में भी शिवलिंग और लघु शैव मंदिरों के साक्ष्य मिलते हैं। आदिवासी परंपरा में भी जनजातीय समाज के लोग पहाड़ की जिस चोटी पर अपने आराध्य देव मरांगबुरु और जंगलों में जिस देवता की पूजा करते है। वो कहीं न कहीं भगवान शिव का ही रूप है।

कई इलाकों में शिव मंदिरों का समूह मौजूद : छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित गुमला के टांगीनाथ धाम पालकोट के देवगांव स्थित कुल 21 लघु शिव मंदिरों का समूह मौजूद है। जबकि अंजन धाम में बहुसंख्यक शिवलिंग और मंदिर सहित बड़े पैमाने पर प्राचीन शैव मठों का प्रमाण भी मिलता हैं। ये सभी शिवलिंग छठी शताब्दी ईस्वी से सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के हैं।

झारखंड में शैव संप्रदाय के धार्मिक सांस्कृतिक क्रियाकलापों की निरंतरता के बारे में पश्चिमी सिंहभूम जिले के बेनीसागर स्थित ऐतिहासिक धरोहर स्थल से भी कई जानकारियों मिलती है। यहां कई शिव मंदिर और मठों का छठी से 8वीं के बीच निर्माण किया गया था। यहां से प्राप्त गणेश दुर्गा भैरव बहुसंख्यक शिवलिंग अत्यंत ही महत्वपूर्ण हैं। दुमका के मालूटी में कुल 65 शैव मंदिरों के प्रमाण हैं।

अजंता की गुफ़ाएं के समान शैलकृत मंदिर : इसके अतिरिक्त शैव अनुयायियों की ओर से पहाड़ियों में शैलकृत मंदिर भी निर्मित किए गए जो अद्भुत और विलक्षण हैं। हजारीबाग के बड़कागांव के महुदी पहाड़ी में कुल 3 शैलकृत मंदिर निर्मित किए गए हैं. जो अजंता की गुफ़ाएं के समान हैं। इस क्षेत्र में ऐसे और भी शैल कृत मंदिर हैं।

मुख्य नदियों में भी स्थित चट्टानों पर शिवलिंग उत्कीर्ण : सबसे दिलचस्प बात है कि झारखंड की प्रमुख नदियों में भी स्थित चट्टानों पर शिवलिंग उत्कीर्ण किए गए हैं। झारखंड की मुख्य नदियों स्वर्णरेखा, दक्षिणी कोयल और दामोदर नदी सहित अन्य सहायक नदियों के अलावा अन्य जल स्रोतों में स्थित चट्टानों पर भी शिवलिंग उत्कीर्ण करने की प्रथा अति प्राचीन है।

रांची के चुटिया में स्वर्णरेखा और हरमू नदी के संगम पर एक जैसी महादेव की कुल 21 शिवलिंग नदी चट्टानों पर निर्मित किए गए हैं। ये नागवंशी राजाओं के शासनकाल में निर्मित किए गए। इसी प्रकार रांची के रातू में ठाकुरगांव स्थित भूर नदी के चट्टानों पर भी शिवलिंग उकेरा गया हैं जो अति प्राचीन है।

बोकारो के चेचकेश्वर धाम के समीप मोदीडीह गांव के बारनी घाट दामोदर नदी स्थित है। वहीं भी शिवलिंग नदी घाट पर बने हुए हैं, जो ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।