नई दिल्ली : चीन का अत्याधुनिक रिसर्च वेसल दा यांग हाओ एक बार फिर हिंद महासागर क्षेत्र की ओर बढ़ रहा है, जिसने अपने ऑपरेशनल बेस के रूप में पोर्ट लुईस, मालदीव को घोषित किया है। यह जहाज चीन के प्राकृतिक संसाधन मंत्रालय के अधीन संचालित होता है और गहन समुद्री अनुसंधान के लिए डिजाइन किया गया है। जहाज की लंबाई लगभग 98.5 मीटर है, जिसमें 60 लोगों की क्षमता वाली क्रू टीम काम करती है।
AUV से लैस है जहाज : जहाज की सबसे खास बात यह है कि इसमें ऑटोनॉमस अंडरवॉटर व्हीकल (AUV) है, जो 6,000 मीटर तक की गहराई में संचालित हो सकता है। यह AUV समुद्र तल की मैपिंग, खनिज संसाधनों की खोज, जलवायु डेटा संग्रह और अन्य वैज्ञानिक अध्ययन के लिए इस्तेमाल होता है। चीन इसे शांतिपूर्ण वैज्ञानिक मिशन के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन माना जाता है कि इसका सैन्य उपयोग भी किया जा सकता है। पनडुब्बी ट्रैकिंग, समुद्री मार्ग निगरानी या मिसाइल टेस्टिंग के लिए भी काम आ सकता है।
चीन ने पहले भी की है ऐसी हरकत : अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 तक यह छठा चीनी रिसर्च वेसल है जो हिंद महासागर में प्रवेश कर चुका है। इससे पहले अन्य जहाजों जैसे दा यांग यी हाओ, शेन हाई यी हाओ, लान हाई सीरीज और शि यान 6 जैसे जहाजों की सक्रियता भी इस क्षेत्र में दिखी है। इनमें से कई जहाजों ने मालदीव, श्रीलंका और अन्य द्वीपीय देशों के बंदरगाहों का उपयोग किया है।
भारतीय नौसेना की है कड़ी नजर : मालदीव को बेस बनाना बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि यह भारत के पास है और हिंद महासागर के प्रमुख समुद्री मार्गों पर स्थित है। हिंद महासागर वैश्विक व्यापार का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। भारतीय नौसेना जहाज की गतिविधियों पर कड़ी नजर रख रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिंद महासागर वैश्विक व्यापार और रणनीतिक संतुलन का केंद्र है, ऐसे में किसी भी देश की बढ़ती समुद्री मौजूदगी पर स्वाभाविक रूप से नजर रखी जाती है।
