पटना/रांची : बुधवार को उदीयमान सूर्य को व्रतियों ने अर्घ्य दिया। इसी के साथ चार दिवसीय चैती छठ संपन्न हो गया। वहीं, व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला उपवास भी खत्म हो गया। बिहार-झारखंड के विभिन्न छठ घाटों पर हजारों की संख्या में व्रती और श्रद्धालु जुटे और पूरे विधि-विधान के साथ भगवान सूर्य की आराधना की।
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू हुआ चैती छठ का महापर्व का समापन हो गया। चैत्र शुक्ल सप्तमी तिथि को छठ व्रती उगते सूरज की पहली किरण को अपना श्रद्धा सुमन अर्पित करने के साथ ही उषा अर्घ्य हुआ। इसके साथ ही उनका 36 घंटे का निर्जला व्रत और ये पर्व संपन्न हो गया। छठ पर्व छठी माता और भगवान सूर्य की उपासना का पर्व है, जो साल में दो बार मनाया जाता है। एक बार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में और दूसरा चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में।
इससे पहले मंगलवार यानी 24 मार्च को छठ व्रतियों ने डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर आभार प्रकट किया। संध्या अर्घ्य पर मुख्य रूप से सूर्य की अंतिम किरण को अर्घ्य देने की परंपरा है। व्रतियों ने नदी, तालाब, सरोवर या घाट पहुंचकर कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया। बांस की सूप में ठेकुआ, फल, गन्ना, नारियल, कसार, केला समेत अन्य पूजन सामग्री अर्पित की।
छठ पूजा का चौथा दिन यानी चैत्र शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि उगते सूर्य को अर्घ्य देने का होता है, जिसे उषा अर्घ्य कहा जाता है। इस बार उषा अर्घ्य 25 मार्च 2026 को दी गयी। विभिन्न नदियों और तालाब घाट पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। सुबह होते ही व्रती नदी में उतर गए और जैसे ही सूर्य की पहली किरण निकली, घाट छठी मइया के जयकारों से गूंज उठा। व्रतियों ने अर्घ्य देकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
फल-फूल और दीपों से सजा रहा दउरा : घाटों पर पारंपरिक छठ गीतों की गूंज, पूजा की थालियों में सजे फल-फूल और दीपों की रोशनी ने माहौल को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया। महिलाएं पीले और लाल रंग के पारंपरिक परिधानों में नजर आईं, वहीं पुरुष और बच्चे भी इस आस्था के पर्व में शामिल दिखे। अर्घ्य के बाद व्रतियों ने प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत पारण किया और एक-दूसरे को छठ की शुभकामनाएं दीं।
