झारखंड : आदिवासियों की ‘त्रासदी’, गरीबी का लिव इन रिलेशनशिप है ‘ढुकू’ परंपरा; एक सामाजिक श्राप

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गुमला : झारखंड में गरीबों के कारण कई परिवार शादी का खर्च उठाने में सक्षम नहीं होते हैं। शादी नहीं होने के बावजूद इन गरीब परिवार के युवक और युवती घर में ही एक साथ रहना शुरू कर देते हैं, लेकिन महीनों और वर्षों तक साथ रहने के बावजूद इन्हें और उनके बच्चों को सामाजिक मान्यता नहीं मिल पाती है।

शादी नहीं से जमीन जायदाद में नहीं मिल पाता हिस्सा : ‘ढुकू’ प्रथा में सामाजिक रीति-रिवाज के अनुसार शादी नहीं हो पाने के कारण इन्हें अपने परिवार में जमीन जायदाद में हिस्सा भी नहीं मिल पाता है और बच्चों का जन्म प्रमाण पत्र से लेकर स्कूलों में नामांकन और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पाता है। यहां तक की मौत होने पर इन्हें अपने मुक्ति धाम या गांव-घर के कब्रिस्तान में भी जगह नहीं मिल पाती है।

शादी के पहले भोज के लिए पैसे का इंतजाम मुश्किल : दरअसल पारंपरिक रीति-रिवाज और विधि-विधान के साथ शादी कराने में सबसे बड़ी बाधा उनकी गरीबी होती है। क्योंकि कई आदिवासी समाज और विभिन्न जातियों में ऐसी मान्यता है कि शादी करने पर पूरे गांव के लोगों को भोज देना पड़ेगा, लेकिन मेहनत-मजदूरी करने वाला परिवार तुरंत इसका इंतजाम नहीं कर पाता है।

‘ढुकू’ प्रथा में रहने के बाद पारंपरिक रीति रिवाज से शादी : लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे युवक और युवतियों को झारखंड में ‘ढुकू’ प्रथा का नाम दिया जाता है। इस परंपरा में युवक और युवती परिवार में एक साथ रहते जरूर है, लेकिन उनकी शादी नहीं हो पाती है। एक साथ महीनों और वर्षों तक रहने के दौरान ये युवक और युवतियां अपनी शादी में होने वाले खर्चे का जुगाड़ करती है। शादी के लिए पैसे की व्यवस्था करने के पारंपरिक रीति रिवाज के साथ उनकी शादी कराई जाती है।

‘ढुकू’ प्रथा में रह रहे 121 जोड़ों की कराई शादी : हालांकि ‘ढुकू’ प्रथा के तहत रहने वाले कई युवक युवतियों की शादी विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से भी कराई जाती है। इसी तरह से गुमला जिले के आदर्श ग्राम तेलगांव में भी नवयुवक संघ की ओर से लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे 121 जोड़ों का सामूहिक विवाह रविवार को कराया गया।

ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीत-संगीत शाली : तेलगांव पंचायत स्थित सामुदायिक भवन परिषद में आयोजित इस सामूहिक विवाह कार्यक्रम में समाजसेवी जगन्नाथ उरांव अपने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीत-संगीत के बीच सभी जोड़ों का विवाह विभिन्न धर्म और समुदाय की रीति रिवाज के अनुसार संपन्न कराया गया।

सामाजिक संगठन की ओर से नव विवाहित जोड़ों को साड़ियां, कुर्ता पजामा और घरेलू उपयोग की कई वस्तुएं भी दी गई। सामाजिक संगठन की ओर से प्रबुद्ध लोगों के सहयोग से सामूहिक भोज का भी आयोजन किया गया।