नई दिल्ली : हिंदू धर्म में शक्ति की उपासना के लिए नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व माना गया है। इस समय नौ दिवसीय चैत्र नवरात्रि 2026 महापर्व चल रहा है, जिसका समापन 27 मार्च को होगा। नवरात्रि के प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के एक अलग शक्ति की साधना के लिए समर्पित है। छठे दिन नवदुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा और व्रत का विधान है। देवी कात्यायनी को शक्ति, सौंदर्य और साहस की प्रतीक माना जाता है। देवी पुराण खासतौर पर देवी भागवत पुराण में मां कात्यायनी को आदिशक्ति का अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप बताया गया है। नवरात्रि की षष्ठी तिथि पर साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होकर उच्च आध्यात्मिक चेतना की ओर अग्रसर होता है, जिससे भक्ति और आत्मसमर्पण की भावना प्रबल होती है।
मां कात्यायनी की उपासना से भक्तों को साहस, धर्म और विजय की प्राप्ति होती है। धर्म ग्रथों में वर्णित है कि महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी भगवती ने उनके घर पुत्री रूप में जन्म लिया, इसलिए माता का नाम कात्यायनी पड़ा। 24 मार्च 2026 को चैत्र नवराात्रि के छठवें दिन माता कात्यायनी की आराधना की जाएगा कहा जाता है कि इनकी पूजा करने से भक्तों को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। देवी कात्यायनी को ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में भी पूजा जाता है।
मां कात्यायनी का स्वरूप : मां कात्यायनी सिंह पर सवार चार भुजाओं वाली देवी हैं। उनके एक हाथ में तलवार, दूसरे में कमल का फूल, तीसरे में अभय मुद्रा और चौथे में वरद मुद्रा है। उनके तेज से भक्तों के सभी कष्टों का अंत हो जाता है। इसके साथ ही देवी की कृपा मिलती है।
देवी कात्यायनी आराधना : नवरात्रि के छठे दिन देवी दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा का बहुत महत्व है। मान्यता है कि देवी कात्यायनी की पूजा में लाल और सफेद रंग के कपड़े पहनना बहुत शुभ होता है। देवी कात्यायनी का ध्यान गोधूलि बेला में किया जाना चाहिए। कथा पाठ करने से पहले माता कात्यायनी के इस मंत्र का जाप जरूर करें- ॐ देवी कात्यायन्यै नम:
मां कात्यायनी का प्रिय भोग : इस दिन मां कात्यायनी की पूजा में उनका प्रिय भोग भी अर्पित करना चाहिए। मां कात्यायनी का प्रिय भोग शहद और शहद से बने व्यंजन हैं। आज के दिन मां कात्यायनी को शहद का भोग अर्पित करना चाहिए। इसके अलावा उन्हें हलवा-पूरी का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। शहद प्राकृतिक मिठास और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। जबकि, हलवा और पूरी का भोग समृद्धि और संतोष का संकेत देती है। शहद युक्त पान का भोग भी देवी कात्यायिनी को लगता है।
मां कात्यायनी की कथा :
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, ‘कत’ नामक एक प्रसिद्ध महर्षि हुआ करते थे। उनका एक पुत्र हुआ, जिसका नाम कात्य पड़ा। आगे चलकर ऋषि कात्य के गोत्र में एक महर्षि कात्यायन हुए, जो अपने तप के कारण पूरे संसार में जाने गए। ऋषि कात्यायन की एक मनोकामना थी कि देवी दुर्गा उनके यहां पुत्री रूप में जन्म लें। ऐसे में मां भगवती को प्रसन्न करने के लिए महर्षि कात्यायन ने वर्षों तक कठोर तपस्या भी की। ऋषि के घोर तप से प्रसन्न होकर मां अंबे ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी इच्छा पूरी करने का वचन भी दिया। इसके बाद देवी ने अपना वचन पूरा करते हुए और ऋषि कात्यायन के घर जन्म लिया। उनकी पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण ही देवी भगवती का नाम कात्यायनी पड़ा।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि महर्षि कात्यायन ने बड़े ही प्रेम से देवी कात्यायनी का पालन-पोषण किया था। इधर पृथ्वी पर महिषासुर का आंतक बढ़ता जा रहा था, वह दुराचारी सारी सीमाएं लांघ रहा था। दरअसल, महिषासुर को ये वरदान मिला हुआ था कि कोई भी पुरुष कभी उसे पराजित नहीं कर सकता, ना उसका अंत कर पाएगा। इसलिए उसे किसी का डर नहीं था और देखते ही देखते उसने देवलोक पर भी अपना कब्जा कर लिया था। तब भगवान विष्णु, ब्रह्मा और महादेव ने उसका अंत करने के लिए अपने तेज से एक शक्ति को उत्पन्न किया। मान्यता है कि महर्षि कात्यायन ने ही इस देवी की सर्वप्रथम विधिवत पूजा की थी, इसलिए देवी को कात्यायनी के नाम से जाना गया।
वहीं, देवी कात्यायनी से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, आश्विन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महर्षि कात्यायन के घर देवी की उत्पत्ति हुई थी। इसके बाद महर्षि ने शुक्ल पक्ष की सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक अपने आश्रम में देवी की विधिवत पूजा की और दशमी को देवी के इस स्वरूप ने महिषासुर का वध किया था। जिसके कारण ही देवी के इस स्वरूप को कात्यायनी के नाम से जाना गया था। वहीं, महिषासुर का वध करने के कारण देवी को ‘महिषासुर मर्दिनी’ के नाम से भी जाना गया।
एक अन्य कथा के अनुसार, देवी दुर्गा का कात्यायनी स्वरूप अमोघ फलदायिनी है। ब्रज की गोपियों ने करुणावतार श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में पाने के लिए कालिंदी यमुना के किनारे देवी कात्यायनी की ही आराधना की थी। यही वजह है कि आज भी मां कात्यायनी पूरे ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वहीं, स्कन्द पुराण में देवी कात्यायनी के बारे में उल्लेख मिलता है कि उनकी उत्पत्ति परमेश्वर के सांसारिक क्रोध से हुई थी।
