हिमाचल : तिब्बती संसद ने झंडा-प्रतीक और राष्ट्रगान के बनाए नए नियम, चीन के जातीय एकता कानून का विरोध

Tibbet-Parliament-Passes-Rules

धर्मशाला : धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में निर्वासन में तिब्बती संसद का 17वां कार्यकाल अपने अंतिम सत्र के साथ खत्म हो गया। यह एक बजट सत्र था, जिसमें लगभग 3475 करोड़ रुपये का सालाना बजट पास किया गया। लेकिन इस सत्र की खास बात सिर्फ बजट नहीं रही, बल्कि कई अहम फैसले भी लिए गए, जो तिब्बती पहचान और संस्कृति से जुड़े हैं।

तिब्बती राष्ट्रीय ध्वज, प्रतीक और गान बना समान नियम : इस सत्र में पहली बार तिब्बती राष्ट्रीय ध्वज (झंडा), राष्ट्रीय प्रतीक (एम्ब्लम) और राष्ट्रीय गान के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट और एक समान नियम बनाए गए। पहले इन चीजों को परंपराओं और पुराने तरीकों के आधार पर इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब इनके उपयोग के लिए आधिकारिक दिशा-निर्देश तय कर दिए गए हैं। नेताओं का कहना है कि ये कदम तिब्बती पहचान और सम्मान को और मजबूत करेगा।

चीन के जातीय एकता कानून के खिलाफ एक प्रस्ताव पास : संसद के सदस्यों ने बताया कि झंडा, प्रतीक और गान पहले से ही तिब्बती इतिहास और संस्कृति का हिस्सा रहे हैं, लेकिन अब इनके सही और सम्मानजनक इस्तेमाल को सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाना जरूरी था। इससे दुनिया भर में रह रहे तिब्बती लोगों के बीच एकरूपता आएगी। इसके अलावा, इस सत्र में चीन के जातीय एकता कानून के खिलाफ एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पास किया गया। तिब्बती संसद ने इस कानून को जनसंहार जैसा बताते हुए इसका कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि यह कानून तिब्बती पहचान, संस्कृति और परंपराओं को कमजोर करने की कोशिश करता है।

चीन पर तिब्बती नेताओं ने लगाया आरोप : तिब्बती नेताओं ने आरोप लगाया कि चीन इस तरह के कानून बनाकर अपने कदमों को सही ठहराने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने 17-प्वाइंट एग्रीमेंट का भी जिक्र किया, जिसे तिब्बतियों के अनुसार जबरन लागू किया गया था और बाद में दलाई लामा ने इसे अमान्य घोषित कर दिया था। गृह मंत्री डोलमा ग्यारी ने कहा कि झंडा, प्रतीक और गान किसी भी देश के गर्व का प्रतीक होते हैं, इसलिए इनके इस्तेमाल में एकरूपता और सम्मान बेहद जरूरी है। उन्होंने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया।