झारखंड में वित्तीय संकट! 11 दिन बीतने के बाद भी नहीं मिला वेतन

Jharkhand-Vetaan

रांची : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राज्य में वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप लगाते हुए कहा कि झारखंड में 26 वर्षों में पहली बार हुआ है कि किसी महीने के ग्यारहवें दिन भी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है। कांग्रेस ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि झारखंड वित्तीय प्रबंधन के मामले में देश के आग्रणी राज्यों में शामिल है।

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने रविवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि राज्य सरकार के वेतन पर सीधे तौर पर 2,35,930 अधिकारी और कर्मचारी निर्भर है। संविदा कर्मी और आउटसोर्स कमी की संख्या भी लगभग 40,000 से 45,000 के आसपास है। यानी कुल 2,75,000 लोगों को 11 तारीख बीतने के बाद भी पैसा नहीं मिला है। प्रतुल ने कहा करीब 15 लाख लोग इन वेतन कर्मियों पर आश्रित है। इनके बीच राशन का लाला पड़ गया है, बच्चों की फीस नहीं दे पा रहे, ईएमआई नहीं भर पा रहे हैं और घर की पूरी अर्थव्यवस्था बैठ गई है।

प्रतुल ने सरकार से प्रश्न किया कि क्या हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर झारखंड की सरकार भी वेतन देने के लिए कर्ज लेने जा रही या किसी एडवांस का इंतजार कर रही है?

प्रतुल ने कहा कि आमतौर पर नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत में दो-तीन दिनों में बजट को राजपाल की स्वीकृति के बाद 5 अप्रैल तक भुगतान होता रहा है। लेकिन इस बार सरकार के वित्तीय मिसमैनेजमेंट के कारण पैसा ही नहीं है। यह नहीं है कि सरकार को पता नहीं था उसके पास पैसा नहीं है। क्योंकि 31 मार्च को ही सरकार बजट का आवंटित 22,000 करोड़ को इसलिए नहीं खर्च पर कर पाई थी क्योंकि उसके पास कोई पैसा ही नहीं था। यह भी वित्तीय कुप्रबंधन का नतीजा था कि सरकार ने जितने का बजट बनाया था, उस हिसाब से राजस्व की वसूली नहीं हो पाई।

31 मार्च को तो ‘ वेज एंड मिन्स एडवांस’ के जरिए कुछ स्थिति बची। प्रतुल ने कहा कि जो केंद्र सरकार पर सौतेले दर्जे का आरोप लगाते हैं,उन्हें याद रखना चाहिए की 31 मार्च को ही केंद्र सरकार ने राज्य को 2300 करोड़ ग्रामीण विकास, पंचायती राज में और 392 करोड़ नगर विकास को ट्रांसफर किया। उसके बाद भी खजाना खाली हो गया।

प्रतुल ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने मुख्यमंत्री आवास के शीश महल के लिए 100 करोड़ के लगभग का बजट का आवंटन कर दिया। कैबिनेट में से पास भी कर दिया। टेंडर भी निकल गया। सिर्फ मूल भवन की कीमत 67 करोड़ है। इंटीरियर और डेकोरेशन और टेंडर के लागत में वृद्धि को नहीं जोड़ा गया है। यानी स्विमिंग पूल ,जकूजी, ऑटोमैटिक मसाज रूम वाले 100 करोड़ के शीश महल के लिए सरकार के पास पैसा है। लेकिन 3,75,000 वेतन भोगी अधिकारी, कर्मचारी और उन पर आश्रित 15 लाख लोगों के पास घर चलाने के लिए भी पैसे नहीं हैं। यही है अबुआ सरकार की रियलिटी चेक।

उधर, झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता लाल किशोर नाथ शाहदेव ने बीजेपी के आरोपों का कड़ा जवाब देते हुए इसे राजनीति से प्रेरित और तथ्यों से परे बताया है। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि कुछ तकनीकी दिक्कतों और पोर्टल के अपडेट प्रक्रिया में रहने के कारण थोड़ी परेशानी जरूर हुई है, लेकिन खजाना खाली होने के बाद पूरी तरह से निराधार है।

उन्होंने कहा कि झारखंड देश के उन राज्यों की सूची में टॉप पर है जिन राज्यों की फिजिकल हेल्थ रैंकिंग उत्कृष्ट है। झारखंड की गिनती उन राज्यों में भी होती है जो अपने आंतरिक संसाधनों के माध्यम से सरप्लस बजट वाला राज्य रहा है। इसके बावजूद खजाना खाली होने का निराधार आरोप लगाकर भारतीय जनता पार्टी नेता लोगों को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।