मप्र : शिक्षक ने एक पेड़ पर उगाये 35 तरह के आम! जापानी ‘मियाजाकी’ और 6 किलो का ‘ब्रूनाई किंग’ भी

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विदिशा : मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के पमारिया गांव के रहने वाले शिक्षक और प्रगतिशील किसान बालकृष्ण विश्वकर्मा ने अपने अनूठे नवाचारों और कड़े परिश्रम से पारंपरिक खेती को आधुनिकता का ऐसा रंग दिया है कि आज वे पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए एक बड़े रोल मॉडल और प्रेरक उदाहरण बन चुके हैं।

बगीचे में महक रहा है दुनिया का सबसे महंगा ‘मियाजाकी’ आम : शिक्षक बालकृष्ण विश्वकर्मा ने अपने बगीचे में जापान की बेहद प्रसिद्ध और दुनिया की सबसे महंगी आम की किस्मों में शुमार ‘मियाजाकी’ (Miyazaki Mango) को सफलतापूर्वक तैयार किया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों रुपये किलो तक बिकने वाले इस आम की एमपी के एक छोटे से गांव में सफल पैदावार होना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

6 किलो का ‘ब्रूनाई किंग’ और ‘अंगूर दाना’ आम भी है मौजूद : शिक्षक बालकृष्ण का बगीचा इस समय दुर्लभ आमों का गढ़ बना हुआ है और दूर-दूर से लोग इसे देखने आ रहे हैं। उनके बगीचे में जहां एक तरफ दुनिया का सबसे भारी माना जाने वाला ‘ब्रूनाई किंग’ (Brunei King) आम आकर्षण का केंद्र है, जिसका वजन 6 किलोग्राम तक पहुंच जाता है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया का सबसे छोटे आकार का ‘अंगूर दाना’ आम भी इसी बगीचे की शोभा बढ़ा रहा है।

ग्राफ्टिंग कर किया जादू, एक पेड़ पर 35 किस्में! : शिक्षक की वैज्ञानिक सोच का सबसे बड़ा प्रमाण उनके द्वारा अपनाई गई ग्राफ्टिंग (कलमकारी) तकनीक है। इस तकनीक के बेहतरीन इस्तेमाल से उन्होंने एक ही आम के पेड़ पर 35 अलग-अलग किस्में विकसित कर दी हैं। यानी एक ही पेड़ की अलग-अलग टहनियों पर अलग-अलग स्वाद और प्रजातियों के आम फल रहे हैं, जो कृषि विशेषज्ञों के लिए भी कौतूहल का विषय है।

आंवले के बाद अब आम में बिखेरा जलवा : यह पहली बार नहीं है जब बालकृष्ण विश्वकर्मा ने ऐसा कोई कमाल किया हो। इससे पहले वे इलाके में आंवले की उन्नत खेती का सफल प्रयोग कर चुके हैं, जिससे प्रेरणा लेकर क्षेत्र के कई अन्य किसानों ने भी अपनी आमदनी को बढ़ाया था। उनकी यह लगातार सफलता दर्शाती है कि ज्ञान, जिज्ञासा और निरंतर प्रयोग से कृषि क्षेत्र में कितने असाधारण परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। उनकी इस उपलब्धि की कहानी एमपी शासन व जिला प्रशासन भी बयां कर रहा है। जेडी जनसंपर्क सोशल मीडिया ने भी उनके फोटो शेयर किए हैं।

आजीविका नहीं, नवाचार की प्रयोगशाला : बता दें कि बालकृष्ण विश्वकर्मा जैसे शिक्षक सह किसान यह साबित करते हैं कि जब शिक्षा, आधुनिक सोच और कड़ी मेहनत का संगम होता है, तो खेती सिर्फ पेट भरने का जरिया या आजीविका नहीं रह जाती, बल्कि वह नवाचार की एक जीवंत प्रयोगशाला बन जाती है। उनके ये प्रयास न केवल स्थानीय किसानों को पारंपरिक ढर्रे से हटकर कुछ नया करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, बल्कि भारतीय कृषि के भविष्य को भी एक नई और समृद्ध दिशा दे रहे हैं।