नई दिल्ली : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सोमवार को बिहार विधान परिषद (एमएलसी) के पद से इस्तीफा देने जा रहे हैं। यह जानकारी जेडीयू विधायक अनंत कुमार सिंह ने दी है। उन्होंने बताया कि पार्टी के कई नेता चाहते थे कि नीतीश कुमार ऐसा कदम न उठाएं, लेकिन मुख्यमंत्री अपने फैसले पर अडिग रहे। दरअसल, हाल ही में नीतीश कुमार को जनता दल (यूनाइटेड) का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी चुना गया है। उनके खिलाफ किसी अन्य नेता ने नामांकन नहीं किया, इसलिए उन्हें निर्विरोध अध्यक्ष घोषित कर दिया गया। इस नई जिम्मेदारी के बाद उनका यह इस्तीफा राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
राज्यसभा जाने की पुरानी इच्छा : इससे पहले 5 मार्च को, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा चुनावों के लिए अपना नामांकन दाखिल किया था। अपने फैसले की घोषणा करते हुए उन्होंने एक भावुक संदेश लिखा। उन्होंने बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ-साथ संसद के सदनों का सदस्य बनने की अपनी पुरानी इच्छा व्यक्त की। उन्होंने एक विकसित बिहार बनाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और नई सरकार को अपना सहयोग और मार्गदर्शन देने की बात कही। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने नीतीश कुमार के फैसले का स्वागत किया और संसदीय लोकतंत्र में उनकी वापसी की सराहना की।
विधायक, फिर केंद्रीय मंत्री और बिहार के सीएम : नीतीश कुमार का राजनीतिक करियर गठबंधन की राजनीति की एक बेहतरीन मिसाल है, जो कई बड़े वैचारिक बदलावों से भरा रहा है। 1985 में एक विधायक के रूप में अपनी यात्रा शुरू करने और बाद में अटल बिहरी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्य करने के बाद, वह पहली बार 2005 में एनडीए के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में बिहार के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए। हालांकि, 2013 से 2024 तक वे बारी-बारी से भाजपा और महागठबंधन (राजद और कांग्रेस) के बीच आते-जाते रहे। इन बार-बार होने वाले बदलावों के बावजूद, उनका राजनीतिक अस्तित्व बेजोड़ बना रहा; हाल ही में, 2025 में उन्होंने पांचवीं बार जबरदस्त चुनावी जीत हासिल की और रिकॉर्ड तोड़ते हुए दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
बिहार में और मजबूत भूमिका में दिख सकती है भाजपा : राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार के इस फैसले से बिहार में भाजपा की भूमिका और मजबूत हो सकती है। साथ ही भविष्य में मुख्यमंत्री पद को लेकर भी नए समीकरण बन सकते हैं। कुल मिलाकर, सीएम नीतीश कुमार का विधान परिषद से इस्तीफा सिर्फ एक औपचारिक कदम नहीं है, बल्कि इसके पीछे बड़े राजनीतिक बदलावों की संभावना भी छिपी हुई है।
