रांची : भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) की अधिकारी निशा उरांव ने कहा कि आदिवासी समाज की परंपराओं को नुकसान पहुंचाने वालों खिलाफ अब एक नए ‘जनी शिकार’ की जरूरत है। वो रविवार को खूंटी जिले के कच्चाबाडी में पड़धीया पड़हा की ओर से आयोजित जतरा को संबोधित कर रही थी।
आईआरएस निशा उरांव ने कहा कि इतिहास के अनुसार जनी शिकार के तहत 12 वर्ष तक यह लड़ाई चली थी। आज फिर से परंपरा बचाने की लड़ाई शुरू हो चुकी है। यह लड़ाई कई वर्षों तक लगातार जारी रहेगी, जब तक मंजिल ना मिले।
जनी शिकार की परंपरा हर 12 साल में : कांग्रेस विधायक रामेश्वर उरांव की बेटी निशा उरांव ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए याद दिलाया कि कैसे तीर-कमान और कुल्हाड़ी लिए महिलाओं ने पुरुषों के कपड़े पहनकर मुगल सैनिक से रोहतासगढ़ किले की रक्षा की थी। वहीं से ये जनी शिकार की परंपरा हर 12 साल में एक बार मनाई जाने लगी।
परंपरा की रक्षा के लिए कई ‘सिनगी दई’ ने लिया जन्म : इस वीरगाथा का नेतृत्व ‘सिनगी दई’ नाम की एक आदिवासी औरत इस लड़ाई का नेतृत्व कर रही थी। आज फिर से आदिवासी समाज के परंपरा की रक्षा के लिए कई ‘सिनगी दई’ जन्म ले चुकी हैं। आज वे कानून और जन आंदोलन से संवैधानिक अधिकार के लिए आवाज उठा रही हैं।
आदिवासी समाज और चर्च का आगमन : इस बीच सोशल मीडिया के माध्यम से निशा उरांव ने आदिवासी समाज में ईसाइयत और चर्च के प्रवेश पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में चर्च और प्रभु यीशु का आगमन पहली बार कब और क्यों हुआ, यह केवल धार्मिक विषय नहीं है। यह सीधे तौर पर आदिवासियों के इतिहास, उनकी मूल पहचान और बदलते सामाजिक ताने-बाने से जुड़ा हुआ है। मिशनरियों की ओर से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में की गई भूमिका के साथ-साथ उन्होंने धर्म परिवर्तन के ऐतिहासिक और सामाजिक पहलुओं पर एक गंभीर दृष्टिकोण सामने रखा।
विदेशी फंडिंग और अवैध धर्मांतरण पर सवाल : धर्मांतरण के मुद्दे पर बोलते हुए आईआरएस अधिकारी ने कहा कि स्वेच्छा या हृदय परिवर्तन से धर्म परिवर्तन फंडामेंटल राइट है और इसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन पैसों और प्रलोभन के दम पर होने वाला धर्मांतरण एक कड़वी सच्चाई है।
अपने दावे को मजबूत करने के लिए उन्होंने हाल ही में ईडी की ओर से देशव्यापी स्तर पर की गई कार्रवाई का हवाला दिया। उन्होंने ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ नामक एक विदेशी संगठन का जिक्र करते हुए कहा कि जांच में यह बात सामने आई है कि इस संस्था की ओर से महज 6 महीनों के भीतर डेविट कार्ड के जरिए करीब 95 करोड़ रुपये की भारी-भरकम कैश निकाली गई थी।
6 महीने में 95 करोड़ रुपये के कैश की क्या आवश्यकता : उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि किसी भी धर्म के सामान्य प्रचार-प्रसार के लिए मात्र 6 महीने में 95 करोड़ रुपये के कैश की क्या आवश्यकता है। इस कैश का इस्तेमाल कहां और क्यों किया गया जा रहा था। जांच एजेंसिंयों के आरोपों का हवाला देते हुए उन्होंने आशंका जताई कि इस भारी भरकम विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर अवैध धर्मांतरण को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। यहीं पर आरोप है और ईडी का भी आरोप था कि कहीं ना कहीं यह धर्मांतरण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
