झारखंड : चतरा नप अध्यक्ष के दो से अधिक संतान पर हाईकोर्ट का सख्त रुख, सरकार को शपथ पत्र देने का आदेश

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चतरा : झारखंड में चतरा नगर परिषद अध्यक्ष पद विवाद अब एक बड़े कानूनी और राजनीतिक संकट का रूप लेता दिखाई दे रहा है। झारखंड हाई कोर्ट ने अध्यक्ष पद पर निर्वाचित अताउर रहमान के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों पर सख्त रुख अपनाते हुए नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव से छह सप्ताह के भीतर शपथ पत्र के माध्यम से जवाब मांगा है। न्यायालय के इस आदेश के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है और नगर परिषद की कुर्सी पर कानूनी सवालों के बादल मंडराने लगे हैं।

चुनावी शपथ पत्र पर उठे बड़े सवाल : आरोप है कि अध्यक्ष पद के निर्वाचित प्रत्याशी अताउर रहमान ने नामांकन के दौरान अपनी संतान संबंधी जानकारी सही तरीके से प्रस्तुत नहीं की। उन्होंने शपथ पत्र में केवल दो बच्चों का उल्लेख किया, जबकि वास्तविक संख्या इससे अधिक है। यदि यह आरोप सही साबित होता है तो यह केवल एक चुनावी त्रुटि नहीं, बल्कि निर्वाचन प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला गंभीर मामला माना जा सकता है। याचिकाकर्ता एवं अध्यक्ष पद के उम्मीदवार रहे राजेश कुमार उर्फ राजेश साह का कहना है कि झारखंड सरकार की वर्ष 2011 की गजट अधिसूचना के अनुसार दो से अधिक जीवित संतान वाले व्यक्ति को नगरपालिका चुनाव लड़ने की पात्रता प्राप्त नहीं है। ऐसे में यदि किसी उम्मीदवार ने तथ्य छिपाकर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की, तो यह पूरे चुनाव की वैधता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

आवेदन पर चुप्पी, तब हाई कोर्ट का दरवाजा : राजेश कुमार ने 16 मार्च 2026 को नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव को आवेदन देकर मामले की जांच और कार्रवाई की मांग की थी। आरोप है कि विभाग ने आवेदन पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इसके बाद अधिवक्ता विनोद सिंह के माध्यम से लीगल नोटिस भी भेजा गया, लेकिन वहां से भी कोई जवाब नहीं मिला। सरकारी स्तर पर कार्रवाई नहीं होने के बाद याचिकाकर्ता ने झारखंड उच्च न्यायालय की शरण ली और W.P.(C) No. 3880/2026 दायर कर पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग की।

हाई कोर्ट ने पूछा-आखिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? : न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया। न्यायालय ने नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया कि वे छह सप्ताह के भीतर शपथ पत्र के साथ अपना पक्ष प्रस्तुत करें और स्पष्ट करें कि शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई की गई तथा आरोपों की वास्तविक स्थिति क्या है। हाई कोर्ट की इस टिप्पणी को प्रशासनिक निष्क्रियता पर भी एक बड़ा सवाल माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि शिकायत इतनी गंभीर थी तो महीनों तक उस पर निर्णय क्यों नहीं लिया गया।

सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, पूरी चुनावी व्यवस्था कटघरे में : इस मामले ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है ? क्या चुनावी शपथ पत्र केवल औपचारिक दस्तावेज बनकर रह गए हैं या उनकी सत्यता की जांच भी होती है? यदि कोई उम्मीदवार महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर चुनाव लड़ सकता है, तो फिर चुनावी पारदर्शिता और पात्रता संबंधी नियमों का क्या महत्व रह जाता है । विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का फैसला केवल एक व्यक्ति के राजनीतिक भविष्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह नगरपालिका चुनावों में शपथ पत्र की विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही की भी परीक्षा होगी।

सबकी नजर अगली सुनवाई पर : हाई कोर्ट द्वारा जवाब-तलब किए जाने के बाद चतरा की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। नगर परिषद अध्यक्ष पद को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो इसके दूरगामी राजनीतिक और कानूनी परिणाम सामने आ सकते हैं। फिलहाल अदालत ने छह सप्ताह बाद अगली सुनवाई निर्धारित की है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या विभागीय शपथ पत्र में ऐसे तथ्य सामने आएंगे जो चतरा नगर परिषद की सत्ता का समीकरण बदल दें, या फिर आरोप केवल राजनीतिक विवाद बनकर रह जाएंगे?