रांची : झारखंड में जून 2026 में होने वाले राज्यसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछ चुकी है। सीटों के गणित को देखें तो झारखंड मुक्ति मोर्चा की एक सीट पूरी तरह से सुरक्षित नजर आ रही है, लेकिन असली रोमांच दूसरी सीट को लेकर है, जहां जीत-हार का फैसला दूसरी वरीयता के वोटों से तय होने की उम्मीद है।
मतों का गणित-2701 कोटा यानी 28 वोटों की जरूरत : झारखंड विधानसभा सचिवालय में संयुक्त सचिव पद से रिटायर और संसदीय मामलों के जानकार मधुकर भारद्वाज का कहना है कि अगर विधानसभा के सभी 81 विधायक वोट डालते हैं और सभी मत सही पाये जाते हैं, तो किसी भी प्रत्याशी को राज्यसभा सदस्य के रूप में निर्वाचित होने के लिए 2701 अंक का कोटा प्राप्त करना अनिवार्य होगा। यानी प्रथम वरीयता के 28 वोट प्राप्त करना जरूरी होगा।
जेएमएम गठबंधन के पास दोनों सीटों पर जीत के लिए पर्याप्त बहुमत : सत्तारूढ़ गठबंधन जेएमएम-कांग्रेस-आरजेडी और भाकपा-माले के पास दोनों सीटों पर जीत के लिए पर्याप्त बहुमत है। गठबंधन के पास 81 सदस्यीय विधानसभा 56 विधायक है, जो दो उम्मीदवारों की जीत के लिए पर्याप्त बहुमत है।
विधानसभा में सत्ता पक्ष की वर्तमान स्थिति : झामुमो 34, कांग्रेस 16, राजद 04, सीपीआई-एमएल 02, कुल 56
विपक्ष को 4 विधायकों का करना होगा जुगाड़ : वहीं भाजपा के 21 विधायकों के अलावा एनडीए फोल्डर में विधायकों की संख्या 24 है। जिसमें जदयू, लोजपा-आर और आजसू पार्टी के एक-एक विधायक शामिल है। ऐसे में बीजेपी गठबंधन के पास एक सीटी के लिए आवश्यक 28 वोट में से 4 वोट कम हैं।
विधानसभा में विपक्ष की वर्तमान स्थिति : भाजपा 21, आजसू 01, जेडीयू 01, लोजपा 01, कुल 24
जयराम महतो फिलहाल किसी पाले में नहीं : जबकि झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के विधायक जयराम महतो किसी पक्ष में नहीं है। ऐसे में जेएलकेएम का एक मत फिलहाल किसी के पाले में नहीं है और यह ‘फ्री फॉर ऑल’ की स्थिति में है। इस तरह राज्यसभा चुनाव में जयराम महतो दूसरी सीट पर उम्मीदवार की जीत में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
प्रथम और द्वितीय वरीयता का जोखिम भरा समीकरण : सत्तारूढ़ झामुमो के लिए अपने पहले उम्मीदवार के लिए ठीक 28 मतों का दांव लगाना जोखिम से खाली नहीं है। यदि एक भी वोट रद्द होता है, तो पूरा समीकरण बिगड़ सकता है।
रणनीतिक पेंच : यदि झामुमो अपने उम्मीदवार को सुरक्षित करने के लिए प्रथम वरीयता के 30 या 32 मत दिलाता है, तो सत्तारूढ़ गठबंधन के दूसरे उम्मीदवार के पास केवल 24 या 26 वोट बचेंगे। ऐसी स्थिति में दूसरे उम्मीदवार को जीतने के लिए विपक्ष से बड़ी सेंधमारी या अन्य दांव लगाने होंगे।
‘द्वितीय वरीयता’ के वोटों पर ही निर्भरता : साफ है कि सत्तारूढ़ दल को अपनी दूसरी सीट और विपक्ष को अपनी एकमात्र सीट बचाने के लिए ‘द्वितीय वरीयता’ के वोटों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।
झारखंड का सीधा अंकगणित हमेशा फेल : झारखंड में राज्यसभा चुनाव का इतिहास गवाह है कि यहां साधारण अंकगणित (एक-एक नियम) के भरोसे चुनाव नहीं जीते जाते। अतीत के दो चुनावों ने सबको चौंकाया था।
वर्ष 2008 में कम वोट पाकर भी जीते नाथवाणी : वर्ष 2008 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा के जे.पी.एन. सिंह प्रथम वरीयता के 35 मत लेकर आसानी से जीते। लेकिन असली मुकाबला दूसरी सीट पर था। निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवाणी को प्रथम वरीयता के मात्र 16 मत मिले थे, जबकि आरके आनंद को 17 मत मिले थे। इसके बावजूद नाथवाणी ने दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर आरके आनंद को शिकस्त दे दी। दिलचस्प बात यह थी कि झामुमो के पास विधानसभा में 17 सदस्य थे, लेकिन उनके अधिकृत उम्मीदवार किशोरी लाल को मात्र 8 मत ही मिले थे।
वर्ष 2014 में निर्विरोध निर्वाचन का दांव : वर्ष 2014 के राज्यसभा चुनाव के समय राज्य में झामुमो, कांग्रेस और राजद की सरकार थी, जबकि विपक्ष में भाजपा-आजसू गठबंधन था। राजद के पास केवल 5 विधायक थे, लेकिन उन्होंने प्रेमचंद गुप्ता को उतारा। वहीं भाजपा-आजसू के समर्थन से परिमल नाथवाणी फिर स्वतंत्र उम्मीदवार बने। अंकगणित ऐसा बैठा कि तीसरा उम्मीदवार मैदान में आ ही नहीं पाया और दोनों निर्विरोध चुन लिए गए।
परिमल नाथवाणी के मैदान में उतरने की चर्चा : झारखंड से 2008 और 2014 में निर्दलीय राज्यसभा सांसद रहे परिमल नाथवाणी वर्तमान में (2020 से) आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सदस्य हैं और उनका कार्यकाल भी अब पूरा होने वाला है। ऐसे में एक बार फिर से उनके झारखंड से चुनाव लड़ने की चर्चा तेज हो गई है।
