झारखंड : JMM सांसद की शादी के बाद ‘आदिवासी पहचान’ पर छिड़ी बहस

Ranchi-JMM

रांची : झारखंड के जेएमएम सांसद विजय हांसदा की शादी के बाद आदिवासीयत पर एक नई बहस छिड़ गई है। जानकारों का कहना है कि धर्मांतरित आदिवासी का विवाह संस्कार चर्च में पादरी के धार्मिक अगुवाई में संपन्न होता है। जो सरना आदिवासी के रीति रिवाज से बिल्कुल अलग है।

भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) ऑफिसर निशा उरांव का कहना है कि कोई जन्म से आदिवासी नहीं होता। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी साफ किया गया है कि आदिवासी के रीति रिवाज ही उसे आदिवासी बनाते हैं। माननीय सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णय ने स्थापित किया है कि आदिवासी के मूल रीति रिवाज ही उसे ‘अनुसूचित जनजाति’ बनाते हैं।

निशा उरांव ने कहा कि धर्मांतरण से जन्म, शादी, मृत्यु और कई अन्य संस्कार बदल जाते हैं। सरना आदिवासियों में पाहन- नायके सभी आदिवासी संस्कार कराते हैं जबकि धर्मांतरित आदिवासी के संस्कार उनके नए धार्मिक गुरु-पुजारी से कराया जाता है। उन्होंने बताया कि ईसाई धर्म में पादरी की ओर से किए जाने वाले मुख्य धार्मिक अनुष्ठान ‘संस्कार’ बपतिस्मा (जन्म संस्कार ) होता है, जिसमें जल के उपयोग से व्यक्ति को शुद्ध करके चर्च की सदस्यता प्रदान किया जाता है।

धर्म परिवर्तन के बाद पादरी के समक्ष अपने पापों को स्वीकार कर ईश्वर से क्षमा मांगने और प्रभु भोज के दौरान रोटी और दाखमधु को ईसा मसीह के शरीर और लहू के रूप में आशीर्वाद लिया जाता है। विवाह संस्कार के दौरान पादरी द्वारा वर-वधू का मिलन कराना और आजीवन साथ रहने की प्रतिज्ञा दिलाया जाता है। जबकि बीमार या मृत्यु शैया पर पड़े व्यक्ति को तेल लगाकर चंगाई और शांति की प्रार्थना की जाती है।

निशा उरांव ने बताया कि ईसाई धर्म में पवित्र आदेश की मान्यता है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को पादरी या नन के रूप में नियुक्त करने का अनुष्ठान किया जाता है। इसके अलावा, पादरी रविवार की प्रार्थना सभा का संचालन, अंत्येष्टि संस्कार और बच्चों के नामकरण जैसे अनुष्ठान भी संपन्न कराते है। इन सब से स्पष्ट है कि धर्मांतरित आदिवासी के रीति रिवाज , सरना आदिवासी के रीति रिवाज से बिल्कुल अलग है।

आईआरएस निशा उरांव ने कहा कि कई मामलों में पाया गया है की धर्मांतरण के बाद भी कुछ रीति रिवाज को आदत के अनुसार पालन किया जा रहा है। कुछ लोग ‘अनुसूचित जनजातीय’ केटेगरी में बने रहने के लिए भी ऐसा कर रहे हैं। लेकिन आदिवासी रीति रिवाज का ‘धार्मिक आधार’ होता है। अगर धार्मिक आस्था ही नहीं है, तो कोरा रीति रिवाज के पालन को कोई मान्यता नहीं मिल सकता ।

उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट आदेश के अनुसार (क्रिमिनल अपील नंबर 1580 of 2026 ) के अनुसार यदि संबंधित व्यक्ति ने अपनी जनजाति की परंपराओं, रीति-रिवाजों और अन्य विशेषताओं का त्याग कर दिया है और परिवर्तित धर्म की प्रथाओं और रीति-रिवाजों को अपनाते हुए उसमें आत्मसात हो गया है, तो ऐसे व्यक्ति को उस जनजाति का अंग नहीं माना जाएगा।