धनबाद : झारखंड के धनबाद में चिकित्सा सेवा को व्यवसाय बनाने वाले संगठित कारोबारियों पर राज्य सरकार नकेल कसने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है। इसी कड़ी में धनबाद के जालान अस्पताल में भर्ती एक मरीज की मौत के बाद गुरुवार की रात को मरीज की मौत के बाद परिजनों ने जमकर हंगामा किया। परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर इलाज में लापरवाही बरतने और समय पर रेफर नहीं करने का आरोप लगाया।
मृतक की पहचान सुसनीलेवा निवासी 48 वर्षीय एजाज अहमद के रूप में हुई है। वह जिला शिक्षा अधीक्षक (डीएसइ) कार्यालय में सीनियर क्लर्क के पद पर कार्यरत थे। उनकी मौत की सूचना मिलते ही परिजन और परिचित बड़ी संख्या में अस्पताल पहुंच गए। इसके बाद अस्पताल परिसर में काफी देर तक तनावपूर्ण स्थिति बनी रही। सूचना मिलने पर धनबाद पुलिस ने मामला शांत कराया।
मृतक के परिजन कैफ अली ने बताया कि एजाज अहमद को तीन अगस्त को तेज बुखार आने के बाद इलाज के लिए जालान अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुरुआत में चिकित्सकों द्वारा इलाज किया गया। लेकिन बुधवार रात अस्पताल से फोन कर बताया गया कि उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई है। इसके बाद परिवार के लोग अस्पताल पहुंचे।
परिजनों का आरोप है कि गुरुवार सुबह से ही अस्पताल के चिकित्सक मरीज को दूसरे अस्पताल रेफर कर ले जाने का दबाव बनाने लगे। लेकिन रेफरल की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं की गई। उनका कहना है कि गुरुवार रात रेफर का कागजात उपलब्ध कराया गया। इसके बाद जब वे मरीज को दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए निकले। तभी रास्ते में उनकी मौत हो गई।
इधर, जालान अस्पताल के यूनिट हेड डॉ सी राजन ने परिजनों के सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि एजाज अहमद को जब अस्पताल लाया गया था तब उनकी स्थिति पहले से ही बेहद गंभीर थी। उनका प्रारंभिक इलाज किसी अन्य अस्पताल में किया गया था और जालान अस्पताल पहुंचने तक वह तेज बुखार के साथ एक्यूट किडनी इंजरी जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहे थे। डॉ राजन ने बताया कि मरीज की गंभीर स्थिति और संभावित जोखिम के बारे में परिजनों को लगातार जानकारी दी गई थी। चिकित्सकों ने पूरी गंभीरता के साथ इलाज किया और आवश्यकता पड़ने पर रेफर करने की प्रक्रिया भी अपनाई। उन्होंने कहा कि अस्पताल पर इलाज में लापरवाही और रेफर में देरी के लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह निराधार हैं।
हालांकि मरीज के परिजनों का कहना है कि धनबाद में नामी-गिरामी निजी अस्पताल मरीजों के परिजनों का आर्थिक दोहन करने से बाज नहीं आ रहे है। मरीज की स्थिति गंभीर हो जाती है तो पल्ला झाड़ते हुए किसी अन्य अस्पताल ले जाने के लिए रेफेर करने का ड्रामा करते है। ऐसे में मरीज के परिजन बेबस हो जाते है और सब कुछ समझते हुए भी लचर हो जाते है। विरोध करने पर पुलिस बुलाकर कानून का भय दिखाकर चुप करा दिया जाता है।
