झारखंड : खूंटी में IRS निशा उरांव ढोल-मांदर की थाप पर थिरकीं, जतरा मेले में दिखा जीवंत नजारा

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रांची : भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) अधिकारी निशा उरांव का आदिवासी जतरा मेले में खास अंदाज देखने को मिला। इस दौरान वो पारंपरिक ढोल की थाप पर खूब थिरकीं। झारखंड के खूंटी जिले में आयोजित ‘आदिवासी जतरा’ मेले में एक बेहद खूबसूरत और जीवंत नजारा देखने को मिला, जब आईआरएस ऑफिसर निशा उरांव पारंपरिक ढोल की थाप पर स्थानीय लोगों के साथ जमकर थिरकीं। उनका यह सादगी भरा और अपनी जड़ों से जुड़ा अंदाज सोशल मीडिया पर खूब सराहना बटोर रहा है।

क्या है आदिवासी जतरा मेला? : निशा उरांव ने बताया कि आदिवासी जतरा यह सिर्फ एक मेला नहीं बल्कि एक रूढ़िवादी आदिवासी और समृद्ध परंपरा का जीवंत प्रतीक है। आदिवासी जतरा आयोजन मुख्य रूप से चार स्तंभों सांस्कृतिक प्रतियोगिता, वर- वधू का चयन, धार्मिक प्रथा का पालन और सामाजिक समरसता पर टिका है।

अलग-अलग गांव के बीच सांस्कृतिक प्रतियोगिता : आदिवासी जतरा में अलग-अलग गांव के बीच नृत्य की प्रतियोगिता होती थी। यह संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आयोजित किया जाता है। मेले में विभिन्न गांवों के बीच पारंपरिक नृत्य प्रतियोगिताएं होती हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य अपनी समृद्ध लोक संस्कृति और कला को बढ़ावा देना तथा उसे जीवित रखना है।

आदिवासी जतरा में वर- वधू का चयन : आईआरएस ऑफिसर निशा उरांव ने बताया कि ऐतिहासिक आदिवासी जतरा सामाजिक मेल-जोल का एक बड़ा केंद्र रहा है। आदिवासी जतरा में युवक -युवती एक दूसरे को पसंद करते थे और फिर बुजुर्गों की सहमति और आशीर्वाद से उनके विवाह संबंध तय किए जाते हैं। इस परंपरा का अब भी पालन करना सुखद हैं।

आदिवासी जतरा धार्मिक प्रथा का पालन : निशा उरांव ने बताया कि आदिवासी जतरा धार्मिक प्रथा का पालन भी रहा है। इस पवित्र मेले की शुरुआत पारंपरिक पूजा-पाठ और अनुष्ठानों के साथ होती है, जो प्रकृति और पूर्वजों के प्रति आभार प्रकट करने का तरीका है।

पूरे गांव और समाज को एक मंच पर लाने वाला मेला : निशा उरांव ने बताया कि साल में एक बार आयोजित होने वाला यह मेला पूरे गांव और समाज को एक मंच पर लाता है। इससे आपसी मतभेद दूर होते हैं और लोगों में घनिष्ठता और भाईचारा बढ़ता है। हालांकि समय के साथ बदलाव आना स्वाभाविक है। किंतु पारंपरिक विरासत के मूल प्रकृति और प्रवृत्ति का संरक्षण जरूरी है।